उघरहिं बिमल बिलोचन ही के। मिटहिं दोष दुख भव रजनी के॥ सूझहिं राम चरित मनि मानिक। गुपुत प्रगट जहँ जो जेहि खानिक॥
गुरुदेव की कृपा से जब हमारा अंतःकरण वैदिक ज्ञान से प्रकाशित होता है, तब हम परम‑सत्य, जो ब्रह्म या परमात्मा है, का साक्षात्कार कर पाते हैं। इस सत्य‑बोध से हमारे दोष, दुख और अज्ञानरूपी रात्रि नष्ट हो जाती है, और तब हम परमानन्द से परिपूर्ण, दिव्य और शांतिमय जीवन का अनुभव करते हैं।
